• मीडिया में हिस्सेदारी से मेरा आशय केवल मीडिया की आन्तरिक संरचना में हिस्सेदारी से नहीं है। मेरा मतलब है कि वंचित तबकों की अभिव्यक्ति की कितनी हिस्सेदारी है उसमें। उसकी एक भूमिका के तौर पर मैंने कुछ काम किया था यह देखने के लिए कि कितने लोग हैं वंचित तबकों के मीडिया में। उससे यह जुड़ता है। हमारे सामने सवाल है कि हिन्दी-क्षेत्र की पत्रकारिता अपने डेढ़ सौ साल के इतिहास में कितनी आधुनिक हुई है। मुझे यह आरम्भ में ही स्पष्ट कर देना चाहिए कि मेरा आशय समाचार माध्यमों की तकनीक या इसके आर्थिक पक्ष से नहीं, बल्कि सामाजिक सरोकारों से है। इस एक-डेढ़ सदी में हम कहाँ पहुँचे हैं? आधुनिकता के नाम पर हमने सिर्फ लिबास तो नहीं बदल लिया? इन सवालों का उत्तर तलाशते हुए हम मीडिया की आधुनिकता को संकटग्रस्त पाते हैं।