• जिस मामले में लालू प्रसाद को सजा हुई है, वह चारा घोटाले के नाम से जाना जाता है। इस घोटाले की संक्षिप्त कथा जानना आवश्यक है। सन् 1974-75 की शुरुआत में ही जब इस घोटाले की शुरुआत हुई, तब बिहार में कांग्रेस का शासन था और डॉ. जगन्नाथ मिश्र मुख्यमंत्री हुआ करते थे। अबाध गति से पूरे दो दशक यह घोटाला चलता रहा। 1990 में जब लालू प्रसाद मुख्यमंत्री बने, तब भी यह रुका नहीं क्योंकि यह सेंधमारी के अंदाज का घोटाला था। ऐसा प्रतीत होता है कि हुक्मरानों को इस घोटाले की कमोबेश जानकारी थी लेकिन किसी एक ही दल के राजनेता इसमें शामिल नहीं थे। दरअसल, यह सर्वदलीय घोटाला था। इस हमाम में सब नंगे थे। जो सत्ता में थे, उनका हिस्सा ज्यादा रहा होगा, जो सत्ता से बाहर थे, उनका हिस्सा कम, लेकिन भागीदार सब थे, वे चाहे पक्ष के नेता हों या विपक्ष के या फिर नौकरशाह या व्यवसायी।

    हम इस घटनाक्रम के सामाजिक-राजनीतिक निहितार्थ की समीक्षा करना चाहेंगे। दलित, पिछड़े तबकों से बार-बार यह बात उठ रही है कि न्यायालयों में उनकी बात न सुनी जा रही है, न समझी जा रही है। इससे जुड़ा प्रश्न यह भी है कि भारतीय न्यायपालिका में द्विजों का वर्चस्व है और दलित-पिछड़े तबकों से उठने वाली हर आवाज को वे कुचलना चाहते हैं।