This is a communinty where book reviewers can share their experiences as book reviewers.

  • बहुजन साहित्य और संस्कृति की अवधारणा ने पिछले कुछ वर्षों में आकार लेना शुरू किया है। अभी हाल (2016) में आए प्रमोद रंजन द्वारा संपादित तीन संकलन- ‘बहुजन साहित्य की प्रस्तावना’, ‘हिन्दी साहित्येतिहास का बहुजन पक्ष’और ‘महिषासुर एक जननायक’- बहुजन साहित्यिक-सांस्कृतिक आंदोलन की प्रस्तावना और अवधारणा को सामने रखते हैं और इसे पल्लवित-पुष्पित तथा विकसित क…[Read more]

  • पटना से प्रकाशित दोआबा के जनवरी-मार्च, 2022 अंक की समीक्षा है। दोआबा का यह अंक लगभग 600 पन्नों का है। इनमें से 533 पन्नों में नीलम नील की दो ‘कथा-डायरी’ प्रकाशित हैं, जिनके शीर्षक क्रमश: ‘आंगन में आग’ और ‘अहिल्या आख्यान’ हैं। शेष पृष्ठों पर उन्हीं पर केंद्रित संपादकीय, संस्मरण आदि हैं। साहित्य की पहचान यह नहीं है कि लेखक कितना संवेदनशील ह…[Read more]

  • दिनों-दिन उपन्यास और कहानियां “पढ़ना” कठिन होता जा रहा है। साहित्य संबंधी लेखन-अध्यापन में लगे हम लोगों को पढ़ने काम अक्सर एक पेशागत काम की तरह करना पड़ता है। ऐसा साहित्य हिंदी में बहुत कम आ भी रहा है जिसे पढ़ कर बहुत कुछ नया मिलने की उम्मीद जगे। वस्तुत: बात सिर्फ हिंदी की नहीं है, परंपरागत रूप से जिसे हम विशुद्ध साहित्य कहते हैं, वह अब अपने समय…[Read more]

  • The last print issue of FORWARD Press was published in April, 2016. This editorial in the last issue of Forward Press has been written by Pramod Ranjan. Thereafter Forward Press continued to be published as a website and also ventured into the business of books. Pramod Ranjan parted ways with Forward Press in October 2019 in protest against the…[Read more]

  • फारवर्ड प्रेस काअंतिम प्रिट अंक अप्रैल, 2016 में प्रकाशित हुआ था। यह उस अंतिम अंक का प्रमोद रंजन द्वारा लिखा गया संपादकीय है। उसके बाद फारवर्ड प्रेस वेबसाइट के रूप में प्रकाशित होता रहा तथा किताबों के व्यवसाय में भी उतरा। फारवर्ड प्रेस के मालिकों द्वारा की जा रही वित्तीय अनियमितता के विरोध में प्रमोद रंजन ने अक्टूबर, 2019 में इस पत्रिका से अलग हो गए।

  • शिमला और हिमाचल से प्रमोद रंजन का गहरा नाता रहा है। वे अपनी युवावस्था के दिनों में यहाँ जीविका की तलाश में आए थे। पुस्तक का एक बड़ा हिस्सा वर्ष 2003 से 2006 के बीच हिमाचल-प्रवास के दौरान लिखी गई उनकी निजी डायरी है। जैसा कि रंजन स्वयं मानते हैं कि यह उनकी मनःस्थितियों का ‘विरेचन’ भी है और साथ ही साथ ‘तात्कालिक मनोभावों, घटनाओं व परिवेशगत…[Read more]

  • शिमला डायरी’ अपने समय और समाज की एक ऐसी साहित्यिक-सांस्कृतिक डायरी और दस्तावेज है, जिसका एक अहम हिस्सा हिंदी पत्रकारिता की दुनिया है। इसका विहंगम अवलोकन किया है चर्चित कवि और पत्रकार प्रमोद कौंसवाल ने, जिन्होंने काफी समय तक चंडीगढ़ में रहते हुए खुद शिमला, चंडीगढ़ और पंजाब की पत्रकारिता की दुनिया को बहुत करीब से देखा है। यह किताब की सिर्फ ए…[Read more]

  • प्रमोद रंजन की चर्चित पुस्तक “शिमला डायरी” एक सुन्दर साज-सज्जा वाली पुस्तक है। सौम्य परिवेश की पृष्टभूमि, हरियाली, फूलों और किन्हीं ऐतिहासिक इमारतों, जन-जीवन के खुलते पन्नों की एक सुन्दर किताब के साथ तीन उपशीर्षकों ‘आलोचना, ‘कहानी-कविताएं’ व ‘मौखिक इतिहास’ के ऊपर “शिमला डायरी” पहली नज़र में ही पाठकों को आकर्षित करती है।

    यह डायरी न केवल अ…[Read more]

  • Shimla Diary is a literary-cultural chronicle and a documentation of its times and society, with a keen focus on the world of Hindi journalism. Well-known poet and journalist Pramod Kaunswal, who has seen Hindi journalism in Shimla, Chandigarh and Punjab at close quarters, pens his impressions of the book. This is not just a book review but a…[Read more]

  • यह हिमाचल प्रदेश के भाषा एवं संस्कृति विभाग की पत्रिका ‘विपाशा’ के वृहत्त कविता विशेषांक की समीक्षा है, जिसमें सूर्यकांत त्रिपाठी निराला, मुक्तिबोध, अज्ञेय, केदारनाथ सिंह, विजेंद्र, पवन करण, प्रदीप सैनी, लीलाधर जगुड़ी, नरेश सक्सेना, मंगलेश डबराल, पंकज सिंह, अनूप सेठी, कुलराजीव पंत आदि की कविताओं को रेखांकित किया गया है।

  • Brahmanical history is based on myths. It neither has been constructed chronologically nor is factually correct. It has eclipsed the reality with a cobweb of myths. To establish a new creed, established dogmas must be disproven. Ish Mishra reviews ‘Mahishasur: Mithak va Paramparayen’ :

    The book Mahishasur: Mithak va Paramparayen (Ma…[Read more]

  • यह पटना से प्रकाशित ‘दोआबा’ पत्रिका के प्रवेशांक की समीक्षा है। दोआबा के संपादक जाबिर हुसेन साहित्यकार के अतिरिक्त राजनेता और समाजकर्मी भी रहे हैं। वे लगभग एक दशक तक बिहार विधान परिषद के सभापति रहे।

    दोआबा के समीक्षित अंक में 100 से अधिक रचानकारों की रचानाएं प्रकाशित हुईं थीं, जिनमें कंवल भारती, मधुकर सिंह,मनमोहन सरल, हृदयेश, प्रे…[Read more]

  • वर्ष 2022 में मेरे द्वारा संपादित ईवी रामसामी पेरियार के लेखों और भाषणों का संकलन हिंदी में पुस्तकाकार प्रकाशित होने पर एक लेखक ने कुछ ऐसे मुद्दों को लेकर विवाद खड़ा करने की कोशिश की थी, जिसका कोई आधार नहीं था। मैंने यह लेख उनके द्वारा इस संबंध में की गई टिप्पणी के उत्तर में लिखा गया था।

    इस लेख में मैंने बताने की कोशिश की है कि हिंदी के प्र…[Read more]

  • Shrinkhal Khemraj is a child poet of an era of transition from post-modernism to post-humanism. And he is worried about all the things which are vanishing as a result. The vanishing things have made his dreams nightmarish.
    He was born into a Buddhist family. Converts to Buddhism from a Dalit background, his family believes in and upholds…[Read more]